Sunday, December 14, 2008

विश्वास

था विश्वास कि
बुलांऊगा मैं तो
ठहर जाओगी तुम ।

क्या हुआ गर अजमाया नहीं था मैंने
- गहराई का माप केवल
कूद कर हत होने से ही होता है क्या ?

तो फिर
यह विश्वास
क्योंकर बे-आधार हुआ ।

गहराई
इसकी भी महसूसी है मैंने
तुम्हारी खोई-खोई, ढूंढती-सी आंखों में,
तम्हारे अबोध स्पर्श की मादकता में,
और तुम्हारी आह के उच्छवासों में ।

पर इस खोखली गहराई के घने अंधेरे
मुझे सदा-सदा अपने मोहजाल में बांध
विभ्रमित नहीं कर सकते ।

अपनी ही पुकार की प्रतिध्वनि की गूंज
जब इनकी सूनी सीमाओं से टकरा
मेरे ही कानों के पर्दे
तार-तार कर देती है ।
तब इस गहराई का मुखौटा
पके गुलाब सा झड़ जाता है ।
और शेष रहता है -
उपेक्षित नज़रों का
शिद्दत से इन्तज़ार करता
बदशक्ल
ठूंठ
इस सच्चाई को दोहराता कि -
अंध विश्वास में ठगे जाना कहां की समझदारी है ॥

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