Monday, February 20, 2012

अपराधी सपने


मैं


मेरी सोच


और मेरी सोच की सीमाएं


कचोट गई थी मुझे


जब अपनी ही नजर में


मैं खुद हो गया था बौना



उस दिन



दोनो पैरों से पोलियोग्रस्‍त उस किशोर को


जब बड़े ही अपने-पन से


संवेदना जताते


मैंने कहा था


''काश... तुम्‍हारा एक पैर ठीक होता


जीने की तकलीफ


ज़रा कम हो जाती''



मेरी आंखों में झांकते हुए


मासूमियत से


उसने पूछा


''क्‍यों एक क्‍यों


दोनो पैर ठीक होते तो् -



मेरी सारी संवेदनाएं


वेदना बन


कोसने लगी मुझे


सपना दिखलाने में भी कंजूसी



और अन्‍तरमन में अपराधबोध लिए


उसके साथ खड़ी उसकी मां


फफक-फफक कर रोने लगी थी



अब


मेरा हर सपना


अपराधी लगता है मुझे


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