Monday, February 20, 2012

नियामत



इस धूप, पानी और हवा से


सबका बराबर का सरोकार है



आप-हम


यही कहते-सुनते हैं कि


खुदा की यह नियामते तो


बराबर-बराबर ही बख्‍शी है उसने


हर किसी के लिए



पर देखों इन पर भी


सेंध लग गयी है



इधर देखो


धूप बरबस कोशिश कर रही है


भव्‍य अट्टालिकाओं से जूझ


सर्विस लेन की उस झोपड़ी तक पंहुचने की


पर सत्‍ता की छांव ने


बांध दिए हैं उसके पांव



और यहां देखों


नदी पर बंध गया है बांध


बंध गया है पानी


पैदा हो रही है उर्जा


इसलिए कि इन अट्टालिकाओं


के नियॉन बल्‍बों की जगमगाहट कम न हो



हवा के हाल भी


कुछ ऐसे ही बेहाल हैं


एयरकंडीशन के जबड़ो ने


जकड़ लिया है उसे


इन अट्टालिकाओं का इन-डोर इनवायरमेंट


इको फ्रेंडली बनाने के लिए


उगल रहा है आग



धूप हवा पानी


अब खुदा नहीं इन्‍सान


ही बक्‍श सकता है

अपराधी सपने


मैं


मेरी सोच


और मेरी सोच की सीमाएं


कचोट गई थी मुझे


जब अपनी ही नजर में


मैं खुद हो गया था बौना



उस दिन



दोनो पैरों से पोलियोग्रस्‍त उस किशोर को


जब बड़े ही अपने-पन से


संवेदना जताते


मैंने कहा था


''काश... तुम्‍हारा एक पैर ठीक होता


जीने की तकलीफ


ज़रा कम हो जाती''



मेरी आंखों में झांकते हुए


मासूमियत से


उसने पूछा


''क्‍यों एक क्‍यों


दोनो पैर ठीक होते तो् -



मेरी सारी संवेदनाएं


वेदना बन


कोसने लगी मुझे


सपना दिखलाने में भी कंजूसी



और अन्‍तरमन में अपराधबोध लिए


उसके साथ खड़ी उसकी मां


फफक-फफक कर रोने लगी थी



अब


मेरा हर सपना


अपराधी लगता है मुझे


अजन्‍मी बेटी की पुकार

मां


क्‍यों जन्‍म से पहले


बेटी को मिटाती हो


खुदा की नियामत का


क्‍यों खून बहाती हो



मां,


तुम तो ममता की मूरत कहलाती हो


भगवान के बाद संसार में


तुम ही तो पूजी जाती हो


फिर क्‍यों नहीं तुम बाबा को समझाती हो


क्‍यों मेरे नन्‍हें अरमानों को तुम चाक किए जाती हो



क्‍यों दहेज के ठेकेदारों से


डरती हो, घबराती हो


दादी के उलाहने


क्‍यों दिल से लगाती हो



दादी भी है एक बेटी


तुम भी तो एक बेटी हो


क्‍यों जन्‍म से पहले


बेटी को मिटाती हो



क्‍यों जन्‍म से पहले


बेटी को मिटाती हो




Wednesday, December 7, 2011

एक पल

जि़न्‍दगी में एक पल.

आया बस एक ही पल के लिए ......

और दे गया पूरी की पूरी

एक जि़न्‍दगी

उम्र तो चुक गयी है मेरी

कह गयी है अलविदा मुझ से

घुट गयी हैं मेरी सांसें

मै पत्‍थर हो गया हूं

बस जिये जा रहा हूं

वही एक पल

सांस-दर-सांस

Saturday, January 2, 2010

कहां हो तुम ? सुनो......

कहां हो तुम ?
सुनो......
रात आज फिर गुनगुना रही है
तुम्‍हारा प्रेमगीत
हौले-हौले ।

वही प्रेमगीत
जो
धीमे-धीमे
लोरी-सा
फुसफुसाती थी तुम
मेरे कानों में ।

सुनकर जिसे
मै
मदहोश-सा
तुम्‍हें अपलक निहारता
पूरी रात गुजार देता था,
गहरे जागते हुए,
तुम्‍हारी मंद-मंद
जलती हुई
आंखों की रौशनी में ।

आज फिर
अपलक निहार रहा हूं
मै,
इस रात को,
पर असंख्‍य सितारों से घूरती रात,
अपने पैनी रौशनियों से
मजबूर कर रही है मुझे
बंद आंखों से करवटें बदलते हुए
रात गुजारने को ।

कहां हो तुम ?
मैं निहारना चहता हूं तुम्हें
आज फिर,
अपलक ।

Tuesday, December 8, 2009

बेताब सूरज

ढलती हुई शाम
सागर की गहराई में उतर जाने को बेताब सूरज
मेरी उंगलियों में उलझी तेरी उंगलिया

एक दूसरे के इतने करीब
कि जमाने की हर निगाह से कोसों दूर

पैरों में ठंडी रेत की मीठी चुभन को रौंदते
खामोशी को गुनगुनाते

मीलों चलते रहें
रात के ढलने तक

साथ चलोगी न ..................

Sunday, June 28, 2009

तू और तेरी मुहब्‍बत

कौन देता है जान, कौन किसके लिए मरता है ।

हर शख्स यहां अपने ही लिए जीता-मरता है ।।

नहीं ऐसा मिला कोई जो कहे कि तेरा हूं मैं,

मैं हूं बस उसी का हर-एक यही दम भरता है ।।

जो न आए हैं अब तक, वो अब न आएंगे,

किसको फुर्सत है तू किसका इंतजार करता है ।।

यह दिन किया था तय नसीब ने तेरी मौत के लिए,

तूने जान दी उन पर, कौन इसका यकीन करता है ।।

जी तो बहुत करता है कि मुहब्‍बत में जान दे दूं मै,

पर बेमुरर्वत इस जहान में मुहब्‍बत कौन करता है ।।