Wednesday, December 7, 2011

एक पल

जि़न्‍दगी में एक पल.

आया बस एक ही पल के लिए ......

और दे गया पूरी की पूरी

एक जि़न्‍दगी

उम्र तो चुक गयी है मेरी

कह गयी है अलविदा मुझ से

घुट गयी हैं मेरी सांसें

मै पत्‍थर हो गया हूं

बस जिये जा रहा हूं

वही एक पल

सांस-दर-सांस

Saturday, January 2, 2010

कहां हो तुम ? सुनो......

कहां हो तुम ?
सुनो......
रात आज फिर गुनगुना रही है
तुम्‍हारा प्रेमगीत
हौले-हौले ।

वही प्रेमगीत
जो
धीमे-धीमे
लोरी-सा
फुसफुसाती थी तुम
मेरे कानों में ।

सुनकर जिसे
मै
मदहोश-सा
तुम्‍हें अपलक निहारता
पूरी रात गुजार देता था,
गहरे जागते हुए,
तुम्‍हारी मंद-मंद
जलती हुई
आंखों की रौशनी में ।

आज फिर
अपलक निहार रहा हूं
मै,
इस रात को,
पर असंख्‍य सितारों से घूरती रात,
अपने पैनी रौशनियों से
मजबूर कर रही है मुझे
बंद आंखों से करवटें बदलते हुए
रात गुजारने को ।

कहां हो तुम ?
मैं निहारना चहता हूं तुम्हें
आज फिर,
अपलक ।

Tuesday, December 8, 2009

बेताब सूरज

ढलती हुई शाम
सागर की गहराई में उतर जाने को बेताब सूरज
मेरी उंगलियों में उलझी तेरी उंगलिया

एक दूसरे के इतने करीब
कि जमाने की हर निगाह से कोसों दूर

पैरों में ठंडी रेत की मीठी चुभन को रौंदते
खामोशी को गुनगुनाते

मीलों चलते रहें
रात के ढलने तक

साथ चलोगी न ..................

Sunday, June 28, 2009

तू और तेरी मुहब्‍बत

कौन देता है जान, कौन किसके लिए मरता है ।

हर शख्स यहां अपने ही लिए जीता-मरता है ।।

नहीं ऐसा मिला कोई जो कहे कि तेरा हूं मैं,

मैं हूं बस उसी का हर-एक यही दम भरता है ।।

जो न आए हैं अब तक, वो अब न आएंगे,

किसको फुर्सत है तू किसका इंतजार करता है ।।

यह दिन किया था तय नसीब ने तेरी मौत के लिए,

तूने जान दी उन पर, कौन इसका यकीन करता है ।।

जी तो बहुत करता है कि मुहब्‍बत में जान दे दूं मै,

पर बेमुरर्वत इस जहान में मुहब्‍बत कौन करता है ।।

Sunday, February 1, 2009

निरीह मन

अधखिली सुबह की खुमारी ओढ़े
अपने ही गर्म बदन की तपिश
बिस्‍तर पर छोड़ उठा
तो मन

एकदम शान्‍त था...
प्राचीन शिव-मन्दिर के
बूड़े पीपल के तले वाले
उस छोटे-से तालाब सा
एकदम शान्‍त...

अंधेरी खामोश रात
रातभर मेरे सिरहाने बैठ
अपनी निशब्‍द थपकियों से
झाड़ती रही थी
पिछले दिन की घूल..
मेरे तन-बदन
तथा दिल और मन से
गहरी पैठी धूल...
और धूल का गहरा पैठा हर अंश...

कितना मासूम लग रहा है यह दिन
अभी-अभी मुस्‍कुराना सीखे शिशु की
बालसुलभ मुस्‍कान सा...
नरम,
निश्‍छल

मालूम है मुझे
पहर-दर-पहर
आस्‍तीनों में छिपे
इस दिन के हाथों के बढ़ते नाखून
शाम ढलते-ढलते
लहू-लुहान कर
इन निरीह मन को पटक जाएंगे
फिर
अंधेरी खामोश रात की
कोसी-कोसी
मखमली गोद में...

पहर-दर-पहर
खूंखार होते उस आदमखोर दिन से
कितने यत्‍नों से
सहेज कर रखी होंगी यह निशब्‍द थपकियां
इस खामोश रात ने
मेरे लिए


सिर्फ मेरे लिए...

Sunday, December 28, 2008

तेरी याद

वो जाड़ों की रिसती रात
सीली सी आगोश में
उफनते अहसास,
भूल जाने दो मुझे,
उनमें अब क्‍या रखा है.......
बस... तेरी याद को साथ सुला रखा है।

तेरे स्‍पर्श का मूक संवाद
तेरे जिस्‍म के हर हिस्‍से का स्‍वाद
वह नमकीन सा मीठा अहसास
आ रहा है याद
मेरे जिस्‍म के हर एक हिस्‍से को
जिसने उसे चखा है......
बस... तेरी याद को साथ सुला रखा है।

नये रिश्‍तों की तपिश से
ठिठुरती सेज
उबलते उच्‍छवासों की चादर ओढ़े
सिहरते, सिमटते जज्‍बातों को
सीने से लगा रखा है.....
बस... तेरी याद को साथ सुला रखा है.

Monday, December 22, 2008

भय

सच है कि मैं
खोना नहीं चाहता था तुम्‍हें ।

तुम भी
पाना चाहती थी मुझे ।

यह भी सच्‍च है
तुम मेरी थी
तुम्‍हें खोने का भय भी
मेरा भय था ।

पर
मैं नहीं था
तुम्‍हारा ।

तुम चाहती थी मुझे
अपना बनाना
पर तुम्‍हें मुझे खोने का भय नहीं था ।

इसलिए
समझ नहीं पायी तुम
कि
किसी अपने को खोने का भय
कहीं अधिक भयभीत करता है
अपनी मौत के भी भय से ।