Sunday, December 14, 2008

जब तुम साथ थी

बन्द मुट्ठी में मेरी कायनात थी,
जब तुम साथ थी तो क्या बात थी ।

यूं ही चलता रहा खुद में खोया हुआ,
यादों में तेरी मैं मदहोश सा ।
हर खुशी का मेरी तुम ही आधार थी,
जब तुम ......................................................॥

मैंने मांगी थी खुशिंया तेरे प्यार की,
तूने वायदों से मुझको दिलासे दिए ।
हकीकत मैं समझा, तू तो बस ख्वाब थी ॥
जब तुम ......................................................॥

कह न पाया कभी हाले दिल तुझसे मैं
बात दिल की तेरी, तेरे दिल में रही ।
मैं भी मजबूर था, तुम भी लाचार थी,
जब तुम ......................................................॥

इकरार

उसका
यूं हल्के से मुस्कुरा कर
झुकी-झुकी नज़रों से
नकारना,
और फिर सराबोर आंखों से
आमन्त्रित-सा कर
एकटक निहारना
क्या भुला पाउंगा कभी ।

वह
अगर सीधे-से
'हां' कर देती
तो बचता ही क्या
याद रखने को
सब भूल जाता ।

वह भी
शायद
नहीं चाहती थी कि
मैं
उसे भुला दूं
इसलिए तो........................

कैसे भूलूं

कैसे भूलूं
उस खामोश स्याह रात में
पायल का छनकना
कैसे भूलूं ।

बरसात की बूंदों का घुघंरू सा खनकना
और थाप पे उनकी दिलों का धडकना
कैसे भूलूं
कैसे भूलूं ......................

चांदनी रात में घर से वो छिप-छिप के निकलना
राह में हर अपने बेगाने से छिपना
और आहट के किसी कि
वो बाहों में सिमटना
कैसे भूलूं
कैसे भूलूं ......................

बढ़े हाथ को आंखों के कोनों से वो तकना
शर्माना, झिझकना, इनकार भी करना
फिर झट से उसे थाम
यूं पास खिसकना
कैसे भूलूं
कैसे भूलूं ......................

'क्यों'

जब भी तुम मिलकर बिछुड़ती
और पूछती -
'कहां मिलोगे फिर ?*

जाने क्यों यह अहसास-सा होता था कि
अब यह साथ ज्यादा दिन टिक नहीं पाएगा ।

मैं फिर सोचता -
'शंका केवल स्थान-भर की ही तो है,
शेष तो सब निश्चित है ।'

अहसास का भ्रम कुछ और गहराया,
जब तुमने उस दिन,
कदम-भर पीछे हट पूछा था -
'कब मिलोगे फिर ?*

मैंने सोचा
क्या अब हर सुबह
दिन से बिछुड़ते चांद को
अपने लौटने का समय दोहराना होगा क्‍या।

तब तुम्हारे प्रश्न के उत्तर में
यक-ब-यक
चांद के ही बोल फूट पड़े थे -
'सूरज के ढलने पर'

जान गया था मैं,
कि तुम्हारे खुले होंठों को यह उत्तर
कुछ और ही कह गया था जैसे ।


और यूं भी
'ढलते सूरज' का अर्थ
अन्यथा ही लिया जाता है ।

पर एक विश्वास था मेरा कि
'मेरे अपने'
मेरी किसी भी बात का अन्यथा अर्थ नहीं लगा सकते ।

पर तुम 'मेरी' कहां थी
तुम्हारा वह होंठों के कोनों से मुस्काना और
झट
सायास
आंखें नीची कर पूछना -
'क्यों ? सूरज के ढलने पर क्यों ?*
स्‍पष्‍ट कह गया कि -
'अर्थ का अनर्थ' हो चुका है ।

तब इस
अनर्थ से विरक्त
कहा था मैंने

'क्‍यांकि अंधेरे की झीनी चादर तले ही हावी हो सकता है
पाप
प्‍यार पर ।

कुछ भी तो नहीं

मुझे नहीं मालूम
'कुछ होना' क्या होता है
तुम्ही नें कहा था ना कि
'क्या था हमारे बीच'
- 'कुछ भी तो नहीं'

पर सोचता हूँ -

कुछ न होता तो मैं हू-ब-हू वही क्यों करता जो तुमने कहा था,
और तुम भी मुझे वह सब करने को किस अधिकार से कह पाती

कुछ न होता तो क्यों आज तुम मेरी परेशानी में यू परेशान होती
और क्यों मैं महसूसता यूं पहले सी ही सिहरन फिर से

कुछ न होता तो क्योंकर शामिल रहता तुम्हारी यादों मे मैं
और क्यों भुला न पाता मैं तुम्हें यूं सालों-साल।

कुछ था तभी तो मैंने मांगा था तुम्हें तुमसे ।
कुछ था तभी तो तुमने 'हां' कहा था - तत्क्षण
कुछ था तभी तो तुम्‍हारे जाने से जिन्‍दगी के सारे मकसद खत्‍म हो गए थे
कुछ था तभी तो आज भी उस खोने की टूटन बाकी है
कुछ था तभी तो वह अनकही तमन्नाएं कचोटती हैं तुम्हें अभी भी

न होता कुछ तो मेरा दिल
कम-से-कम आज तो मेरे इख्तयार में होता
और तुम भी यूं अपनों ही की तरह मुझे भूल जाने का
इससार फिर से न कर पाती उसी अधिकार के साथ

शायद 'कुछ भी तो नहीं' था
तभी मैं यू फिर-से विलग हो गया हूँ तुमसे
मात्र तुम्हारे कहने भर से ।

विश्वास

था विश्वास कि
बुलांऊगा मैं तो
ठहर जाओगी तुम ।

क्या हुआ गर अजमाया नहीं था मैंने
- गहराई का माप केवल
कूद कर हत होने से ही होता है क्या ?

तो फिर
यह विश्वास
क्योंकर बे-आधार हुआ ।

गहराई
इसकी भी महसूसी है मैंने
तुम्हारी खोई-खोई, ढूंढती-सी आंखों में,
तम्हारे अबोध स्पर्श की मादकता में,
और तुम्हारी आह के उच्छवासों में ।

पर इस खोखली गहराई के घने अंधेरे
मुझे सदा-सदा अपने मोहजाल में बांध
विभ्रमित नहीं कर सकते ।

अपनी ही पुकार की प्रतिध्वनि की गूंज
जब इनकी सूनी सीमाओं से टकरा
मेरे ही कानों के पर्दे
तार-तार कर देती है ।
तब इस गहराई का मुखौटा
पके गुलाब सा झड़ जाता है ।
और शेष रहता है -
उपेक्षित नज़रों का
शिद्दत से इन्तज़ार करता
बदशक्ल
ठूंठ
इस सच्चाई को दोहराता कि -
अंध विश्वास में ठगे जाना कहां की समझदारी है ॥

चींटियों सी यादें

दिन पर दिन
इंच-दर-इंच
धंसता ही जा रहा हूं
गहरे और गहरे ।

इस सीलन भरे अंधकार में

लाल छोटी चींटियों सी यादें
नोचती
कचोटती
अतीत के हर उजले पलांश को
एक-एक कर
सामने ला पटकती हैं

उजले पलों की नुकीली
सुइयों-सी किरणें
अंधकार के अहसास को
और गहराती हैं
और
तार-तार कर जाती है
इस दिल को ।